राजेश जायसवाल/मुंबई
देशभर में भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का पर्व ‘रक्षाबंधन’ शुक्रवार, (28 अगस्त) को हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में रक्षाबंधन के पावन मौके पर केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने मुंबई के रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा में जाकर रक्षाबंधन मनाया।
यहां मंत्री अठावले ने कहा कि आज पहली बार मैं ‘कमाठीपुरा’ आया हूं। यहां रहने वाली महिलाएं मजबूरी में यहां रह रही हैं। अनेक राज्यों की महिलाएं यहां आती हैं। उन्होंने अपने हाथों से मुझे राखी बांधी है। मैं उनकी समस्या का समाधान करने के लिए प्रयत्न करने वाला हूं। उनको मुख्यधारा में लाने के लिए उनको रोजगार देना जरूरी है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के राज्य मंत्री रामदास अठावले महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य हैं। 66 वर्षीय रामदास अठावले ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए)’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और वे खुद मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के अगलगांव (संग्रामपुर) में हुआ था और वर्तमान में वे मुंबई रहते हैं।

बता दें कि कमाठीपुरा मुंबई के ग्रांट रोड (पूर्व) में स्थित भारत के सबसे पुराने और चर्चित रेड-लाइट एरिया में से एक है। किसी जमाने में इसे कोलकाता के सोनागाछी की तरह एशिया के सबसे बड़े रेड-लाइट जिलों में गिना जाता था। 1795 के आसपास अंग्रेजों ने मुंबई के सात द्वीपों को जोड़ने के लिए कंस्ट्रक्शन का काम शुरू किया था। इसके लिए आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से निर्माण मजदूरों को लाया गया, जिन्हें ‘कामाठी’ (मजदूर) कहा जाता था। उन्हीं के नाम पर इस इलाके का नाम ‘कमाठीपुरा’ पड़ा।
हाल के सालों में कमाठीपुरा की तस्वीर तेजी से बदल रही है। कारोबारी हब, सेक्स ट्रेड अब इस इलाके की मुख्य पहचान नहीं रह गया है। अब यहां बड़े पैमाने पर कबाड़ मार्केट, गारमेंट डाइंग (कपड़ों की रंगाई) और छोटे चमड़े के कारखाने खुल चुके हैं। महाराष्ट्र सरकार (MHADA) और प्राइवेट बिल्डर्स इस पूरे इलाके का कायाकल्प कर रहे हैं। पुरानी जर्जर इमारतों को तोड़कर आधुनिक आवासीय और व्यावसायिक टावर बनाए जा रहे हैं, जिसके कारण यह क्षेत्र अब एक नए आधुनिक शहर में तब्दील हो रहा है। इस पुनर्विकास के चलते पुरानी कोठियां और ब्रॉथल्स बंद हो रहे हैं, जिससे बची-खुची सेक्स वर्कर्स मुंबई के बाहरी इलाकों (जैसे-भिवंडी, नालासोपारा) की तरफ शिफ्ट होने को मजबूर हैं।
कमाठीपुरा आना ‘धोखा और बिका’ जाना!
मुंबई के कमाठीपुरा के इतिहास में गंगूबाई काठियावाड़ी (असली नाम गंगा हरजीवन दास काठियावाड़ी) का नाम 1960 के दशक की एक शक्तिशाली और प्रभावशाली महिला के रूप में दर्ज है। गुजरात के काठियावाड़ के एक प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखने वाली ‘गंगा’, अपने पिता के अकाउंटेंट रमणिक लाल के साथ बगावत कर मुंबई आई थीं। लेकिन मुंबई लाकर रमणिक लाल ने उन्हें महज 500 रुपये में कमाठीपुरा के एक कोठे पर बेच दिया। शुरुआती संघर्ष और त्रासदियों के बाद गंगा ने हालातों से समझौता किया और ‘गंगू’ के नाम से कमाठीपुरा में अपनी पहचान बनाई। अपनी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता के कारण वह जल्द ही कोठे की मालकिन और इलाके की प्रमुख (घरवाली) बन गईं।
अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक रसूख करीमलाला से रिश्ता!
मीडिया रिपोर्ट्स और एस हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ के मुताबिक, एक कुख्यात अपराधी द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद गंगूबाई ने माफिया डॉन करीमलाला से न्याय की गुहार लगाई थी। उनकी हिम्मत से प्रभावित होकर करीमलाला ने उन्हें अपनी मुंहबोली बहन बना लिया, जिसके बाद कमाठीपुरा में उनका वर्चस्व और अधिक बढ़ गया।
गंगूबाई ने कभी भी किसी भी महिला या लड़की को उसकी मर्जी के खिलाफ कोठे पर नहीं रखा। उन्होंने वेश्यावृत्ति में जबरन धकेली गईं कई लड़कियों को मान-सम्मान के साथ उनके घरों वापस भिजवाया और यौनकर्मियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
कमाठीपुरा के ‘रेड लाइट एरिया’ को हटाने के विरोध और महिलाओं की समस्याओं को लेकर उनकी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी मुलाकात का जिक्र मिलता है। उनके सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों के कारण आज भी कमाठीपुरा के कई कोठों और स्थानों पर उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है तथा उनकी तस्वीरें भी लगाई हुई देखी जाती हैं।
पहले ‘लाल बाजार’ और अब कमाठीपुरा
शुरुआत में ब्रिटिश सरकार ने अपने सैनिकों के मनोरंजन और ‘कंफर्ट जोन’ के लिए इस इलाके को वेश्यावृत्ति के केंद्र के रूप में बढ़ावा दिया, जिसे तब ‘लाल बाजार’ कहा जाता था। यह क्षेत्र मुख्य रूप से 1 से 14 तंग गलियों में बंटा हुआ है, जहां छोटे और बेहद कम हवादार कमरों (ब्रॉथल्स) में सेक्स वर्कर्स रहती हैं। एक समय यहां हजारों की संख्या में सेक्स वर्कर्स थीं, लेकिन वर्तमान में यह संख्या सिमटकर तीन-चार हजार के आसपास रह गई है, जिनमें से अधिकतर सेक्स वर्कर्स पश्चिम बंगाल और कर्नाटक से हैं। कमाठीपुरा के इतिहास में गंगूबाई काठियावाड़ी का नाम सबसे प्रमुख रहा है, जिन्होंने 1960 के दशक में यहां की महिलाओं और अनाथ बच्चों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी।
