नेटवर्क महानगर/मुंबई
महाराष्ट्र सरकार ‘झोपडपट्टी पुनर्वसन प्राधिकरण’ (SRA) परियोजनाओं के तहत मुंबई झुग्गीवासियों की झुग्गी-झोपड़ियों को हटाकर उन्हें पक्का घर देने और शहरी जीवन प्रदान करने की एक बेहतर पहल करती आ रही है। जिनमें झुग्गीवासियों को बेहतर, मुफ्त आवास और बुनियादी ढांचा प्रदान करना शामिल है। जिसके लिए निजी बिल्डरों को प्रोत्साहन (जैसे-उच्च एफएसआई और टीडीआर) मिलता है, ताकि वे गरीबों के लिए घर एक अच्छा आशियाना मुहैया कराकर और अतिरिक्त फ्लैट बाजार में बेचकर लाभ भी कमा सकें। लेकिन एसआरए परियोजनाओं में लगातार धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं, जिससे हजारों गरीब परिवारों का सपना अधूरा रह जाता है। इन घोटालों की जांच के लिए आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और अदालतें सक्रिय हैं, लेकिन समस्या इतनी गहरी है कि इससे निजात मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
एसआरए (SRA) की झुग्गी पुनर्वास परियोजनाओं में अक्सर बड़े घोटाले सामने आते हैं, जिनमें डेवलपर्स द्वारा पैसे लेकर फ्लैट न देना, फर्जी दस्तावेज बनाना, एसआरए अधिकारियों और स्थानीय सफेदपोश राजनेताओं की मिलीभगत से हेराफेरी करना और झुग्गीवासियों को ठगना शामिल है। जैसे हाल ही में बोरीवली में 200 खरीदारों से ₹32 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला और वर्ली में परियोजना रुकने से 2,500 परिवारों का सपना टूटने जैसी घटनाएं, जिसके कारण मुंबई में कई एसआरए घोटालों पर आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की जांच और कानूनी कार्रवाई चल रही है, जिससे आम जनता का भरोसा घट रहा है। इसमें बिल्डर और एसआरए अधिकारियों की संलिप्तता भी सवालों के घेरे में है?
ऐसा ही एक धोखाधड़ी का मामला सायन-आकार एसआरए को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (भंडारवाड़ा) स्लम पुनर्विकास परियोजना को लेकर सामने आया है। जिसमें शिकायकर्ता ने ₹100 करोड़ से अधिक के आर्थिक घोटाले का गंभीर आरोप लगाया है। इस मामले में भाजपा की स्थानिक नगरसेविका राजेश्री शिरवडकर के पति राजेश शिरवडकर, वार्ड अध्यक्ष भावेश तेलंगे, वैभव वोरा और उनके सहयोगियों के खिलाफ मुंबई पुलिस, धर्मादाय आयुक्त और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) में लिखित शिकायत दर्ज की गई है।
शिकायकर्ता ने आरोप में दावा किया है कि ये एसआरए परियोजना 1995 में शुरू हुई थी। उस समय परिशिष्ट-2 (Annexure II)) के अनुसार, 412 में से लगभग 500 झुग्गी निवासी पात्र और 88 अपात्र थे। हालांकि, 2015 तक यह परियोजना अधर में लटकी रही। तभी स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर परिशिष्ट-1 (Annexure I) में नाम शामिल कर लाभार्थियों को बढ़ाने का कार्य किया गया। जिसमें 100 से अधिक लोगों को बेकायदेशीर तरीके से पात्र कराया गया।
45 लाख रुपये में हुई झोपड़े की बिक्री?
शिकायतकर्ता के मुताबिक, पात्रता का लालच देकर कई झुग्गी निवासियों से बड़ी रकम वसूली गई। कुछ पात्र झुग्गियों को लगभग 45 लाख रुपये में बेचने का भी आरोप है, जिससे घोटाले की राशि ₹100 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, ऐसा दावा किया गया है।
परिवार के नाम पर किया गया झोपड़े पर कब्जा?
शिकायतकर्ता के अनुसार, भाजपा युवा नेता भावेश तेलंगे ने अपने परिवार के सदस्यों- केतन तेलंगे, बलीराम तेलंगे के नाम पर 20 से अधिक झोपड़ों पर कब्जा किया और बाद में कुछ को बेच भी दिया। शिकायत में कहा गया है कि वहीं, वैभव वोरा और उनके रिश्तेदार पात्र नहीं होने के बावजूद इसके लाभार्थी बने हैं। शिकायतकर्ता अतुल बबन भिसे ने अपने आरोप में यह भी दावा किया है कि लोगों को विश्वास में लेने के लिए घोटाले का ये पूरा खेल माटुंगा स्थित समृद्धि हाइट्स, ऑफिस नंबर 401 में बैठकर संचालित किया जा रहा था। उन्होंने दावा किया है कि संबंधित विभाग द्वारा इसकी निष्पक्षता से जांच किये जाने पर वहां फर्जी दस्तावेज और सबूत मिल सकते हैं। शिकायतकर्ता भिसे ने इस मामले में सरकार से मांग कि है कि स्वतंत्र जांच एजेंसी ईडी, आर्थिक अपराध शाखा (EOW) से इसकी जांच करवाकर संबंधितों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए। जिससे लोगों का सरकारी तंत्र पर भरोसा बना रहे और झुग्गीवासियों को न्याय मिल सके।
