मुंबई के मशहूर डब्बावाले
नेटवर्क महानगर/मुंबई
मुंबईकरों की लाइफलाइन कहे जाने वाले डब्बावाले 6 दिनों की छुट्टी पर जा रहे हैं। वार्षिक ग्रामदेवता उत्सव पर 6 दिनों की छुट्टी पर जा रहे डब्बावालों को लेकर मुंबईकरों से ‘डब्बावाला संघ’ ने खास अपील करते हुए कहा है कि वो 6 दिन की छुट्टी पर जा रहे डब्बावालों का वेतन न काटे। डब्बावाले 30 अप्रैल , 2026 से अगले 6 दिन यानी 4 अप्रैल, 2026 की अवधि तक सर्विस नहीं दे पाएंगे। वो 5 अप्रैल से काम पर लौटेंगे। डब्बावाले 30 अप्रैल से 4 अप्रैल तक वार्षिक उत्सव के लिए अपने घरों पर रहेंगे, जिससे मुंबईकरों को डब्बेवालों की सेवा नहीं मिले सकेगी और उन्हें विकल्प तलाशने होंगे।
बता दें कि डब्बावाले हर साल चैत्र महीने में अपने पैतृक गांवों में होने वाले ग्रामदेवता के वार्षिक उत्सवों और मेलों में शामिल होने के लिए 6 दिन की छुट्टी लेते हैं। डब्बावालों की परंपरागत वार्षिक छुट्टी का हवाला देते हुए ‘डब्बावाला एसोसिएशन’ ने सभी ग्राहकों और मुंबईकरों से अगले 6 दिन की छुट्टी के दौरान डब्बावालों की छुट्टी नहीं काटने की अपील की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डब्बावालों की 6 दिनों छुट्टी पर रहने से डब्बावालों की सर्विस पूरी तरह ठप पड़ जाएगी, इससे मुंबई के लगभग 80,000 से 2 लाख नौकरीपेशा लोगों पर जीवन पर असर गहरा पड़ना तय है। जो रोज़ाना घर के खाने के लिए डब्बावालों पर निर्भर करते हैं। डब्बावाले आगामी 5 अप्रैल 2026 से दोबारा अपनी नियमित सेवा शुरू करेंगे, तब तक टिफिन सेवा का उपयोग करने वाले उनके ग्राहकों को घर से खाना लाना होगा या फिर बाहर से खाना पड़ेगा।
गैस के गंभीर संकट से जूझ रही है डब्बावाला सेवा
मुंबई में लगभग 5,000 डब्बावाले काम करते हैं, ये डब्बावाले रोजाना लगभग 2 लाख लोगों को उनके घर से कार्यालय तक दोपहर का भोजन पहुंचाते हैं। यह 130 से अधिक वर्षों से चली आ रही एक अनूठी और अत्यधिक सटीक डिलीवरी सेवा है।
उल्लेखनीय है 130 साल पुरानी डब्बावाला सेवा एलपीजी गैस के गंभीर संकट से भी जूझ रही है. हालात ऐसे हैं कि जो डब्बावाले हर रोज 80 हजार लोगों तक समय पर खाना पहुंचाते थे, उनके अपने किचन के चूल्हे ठंडे पड़ने लगे हैं। कमर्शियल गैस सिलेंडर की किल्लत और इसकी ब्लैक मार्केटिंग ने संकट खड़ा किया है, आरोप है कि जो सिलेंडर सामान्य दाम पर मिलते थे, वे कुछ हिस्सों में अब 5 से 6 हजार रुपये में ब्लैक में बेचे जा रहे हैं।
डब्बावाला एसोसिएशन का कहना है कि 130 साल के इतिहास में हमने गैस की ऐसी किल्लत कभी नहीं देखी। हम इतनी महंगी गैस नहीं खरीद सकते. अगर सरकार ने दखल नहीं दिया, तो मुंबई की ये ऐतिहासिक सेवा ठप हो सकती है।
डब्बावाला एसोसिएशन का कहना है कि लागत बढ़ने के बावजूद उन्होंने खाने के दाम नहीं बढ़ाए हैं, लेकिन मजबूरी में डब्बों की संख्या कम करनी पड़ी है। हज़ारों डब्बावाले रोजाना मुंबई के दफ्तरों और घरों में गरमा-गरम खाना पहुंचाते हैं परन्तु गैस न मिलने से कई टिफिन किचन बंद होने की कगार पर हैं।
