Asha Bhosle Death update
राजेश जायसवाल/मुंबई
मशहूर गायिका आशा भोसले का रविवार, (12 अप्रैल 2026) को मुंबई में निधन हो गया, ब्रीच कैंडी अस्पताल के चिकित्सकों ने इसकी पुष्टि की है। आशा भोसले को कार्डियक अरेस्ट के बाद शनिवार को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन की खबर मिलते ही सोशल मीडिया पर शोक की लहर है। मशहूर सिंगर आशा भोसले के फैंस और सेलेब्स सोशल मीडिया के जरिए अपनी श्रद्धांजलि देते हुए नजर आ रहे हैं। उनका अंतिम संस्कार सोमवार को किया जाएगा। आशा भोसले के निधन से पूरे देश में शोक की लहर व्याप्त है। राजनीतिक जगत की दिग्गज हस्तियों ने भी आशा भोसले के निधन पर शोक संवेदनाएं जताई है। पीएम मोदी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी समेत तमाम लोगों ने आशा भोसले के निधन पर गहरा शोक जताया है। हालांकि, आशा भोसले के निधन से कुछ घंटे पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिग्गज गायिका के स्वस्थ होने की कामना की थी। उन्होंने एक्स पर लिखा-”यह सुनकर चिंता में हूं कि आशा भोसले जी को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उनके अच्छे स्वास्थ्य और जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूं।
आशा भोसले की सेहत की बात करें तो उन्हें अचानक कार्डियक अरेस्ट आया, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनका इलाज इमरजेंसी मेडिकल यूनिट में चला। आशा भोसले के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी उनकी पोती जनाई भोसले ने इंस्टाग्राम पर दी थी। उन्होंने पोस्ट में लिखा- मेरी दादी आशा भोसले बहुत ज्यादा थकान और छाती के इन्फेक्शन की वजह से अस्पताल में भर्ती हैं। उनका इलाज चल रहा है और उम्मीद है कि सब ठीक हो जाएगा। हम आपको जल्द ही अच्छी खबर देंगे।
गौरतलब है कि आशा भोसले का नाम भारतीय संगीत इतिहास में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी ज्यादा समय तक संगीत जगत में योगदान दिया है। उन्होंने अपने करियर में तकरीबन 12 हजार से ज्यादा गाना गाए हैं, जिनमें ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दम मारो दम’, ‘ये मेरा दिल’, ‘चुरा लिया है तुमने’, ‘इन आंखों की मस्ती के’, ‘दिल चीज क्या है’ जैसे सुपरहिट गाने शामिल हैं। उन्होंने गजल, भजन, पॉप और क्लासिकल हर शैली में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उन्होंने ओ.पी. नैयर, आर.डी. बर्मन और ए.आर. रहमान के साथ मिलकर कई यादगार गीत दिए. उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार, फिल्मफेयर अवॉर्ड, दादासाहेब फाल्के सम्मान और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी गिनती दुनिया के सबसे ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने वाले कलाकारों में भी की जाती है।
कहते हैं, शरीर चला जाता है, लेकिन कुछ आवाज़ें हवा में ठहरी रह जाती हैं, दूर तक, देर तक, कभी-कभी हमेशा के लिए. ‘नया दौर’ से ‘तीसरी मंज़िल’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ से ‘उमराव जान’ और ‘इजाज़त’ से होते हुए ‘रंगीला’ तक… वक़्त बदला, मंज़र बदले, पीढ़ियां बदलीं, पर्दे पर नायिकाएं बदलीं, पर आशा भोसले की आवाज़ हमेशा जवान रही।
हिंदी प्लेबैक सिंगिंग के क्षितिज पर जब लता मंगेशकर नाम के सूरज की चमक के आगे अपनी एक अलग लौ जलाना आशा भोसले की ज़िद थी। उस दौर में यह लगभग असंभव जैसा था। लेकिन अपनी ज़िद और बेमिसाल प्रतिभा के दम पर, आशा उस साये से बाहर निकलीं और संगीत के क्षितिज पर अपना एक मुकम्मल आसमां बनाया। संगीत से आशा का नाता बचपन में ही जुड़ गया था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता और मराठी रंगमंच के एक सम्मानित शख़्सियत थे। उनके पांच बच्चों- लता, मीना, आशा, ऊषा और पुत्र हृदयनाथ के बीच सुरों की सरगम बचपन से ही गूंजती थी।
बचपन के दिनों में लता और नन्हीं आशा की जोड़ी अटूट थी। आशा साये की तरह अपनी बड़ी बहन के पीछे-पीछे चलतीं रहीं। लेकिन जब आशा सिर्फ 9 साल की थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया। पिता के जाने से मंगेशकर परिवार गहरे आर्थिक संकट में घिर गया। गुज़ारे की तलाश में परिवार पुणे और कोल्हापुर से होता हुआ 1945 में बंबई (मुंबई) आ बसा। यहां 14 साल की लता ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली और फ़िल्मी दुनिया के मुश्किल गलियारों में अपना संघर्ष शुरू किया। जल्द ही आशा भी उनके संघर्ष में साथ हो लीं।
साल 1948 में फ़िल्म ‘चुनरिया’ के ज़रिए आशा ने पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ अपना पहला गीत ‘सावन आया रे’ गाया। इसके ठीक एक साल बाद, 1949 में फ़िल्म ‘रात की रानी’ से उन्हें अपना पहला सोलो (एकल) गीत मिला। यही वह साल था, जब बड़ी बहन लता मंगेशकर के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। फ़िल्म ‘महल’ के गीत ‘आएगा आनेवाला’ ने लता को रातों-रात कामयाबी के उस शिखर पर पहुंचा दिया जहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
1950 के दशक में लता तेज़ी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगीं। नौशाद, सी रामचंद्र, शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों की वे पहली पसंद बन गईं। लता हिंदी पार्श्व गायन पर एकाधिकार जमा रही थीं, वहीं जी-तोड़ मेहनत के बावजूद आशा को वह मुकाम नहीं मिल पा रहा था।
उस दौर में आशा को ज़्यादातर बी-ग्रेड या कम बजट वाली फ़िल्मों में ही मौके मिलते थे। वे एआर क़ुरैशी, सज्जाद हुसैन और सरदार मलिक जैसे संगीतकारों के साथ काम तो कर रही थीं, लेकिन बड़े संगीतकार और मुख्यधारा के बड़े बैनर उनसे दूर थे।
आशा भोसले की जीवनी लिखने वाले फ़िल्म इतिहासकार राजू भारतन ने उनके शुरुआती दिनों को याद करते हुए एक इंटरव्यू में कहा था, शुरुआत में आशा भोसले कोई करिश्मा नहीं थीं। वे बस एक ‘स्ट्रगलर’ थीं. मैंने उन्हें काम के लिए जूझते देखा है। अगर निर्माता लता को नहीं ले पाते थे, तो उनकी अगली पसंद गीता दत्त या शमशाद बेगम होती थीं। उस फ़ेहरिस्त में आशा का तो कहीं नाम भी नहीं आता था। इसलिए उन्हें जो भी मिला, उन्होंने गाया। उनके साथ एक समस्या उनकी ‘मराठी-मिश्रित हिंदी’ और उच्चारण की भी थी, उन्होंने लता की तरह अपनी उर्दू सुधारने पर उतना काम नहीं किया था। इसके अलावा, उनकी निजी ज़िंदगी और शादीशुदा जीवन भी बेहद उतार-चढ़ाव और मुश्किलों से भरा रहा। जिस निजी घटना का ज़िक्र राजू भारतन ने किया, वो उस समय हुई जब आशा सिर्फ़ सोलह साल की थीं।
उन्होंने 31 साल में घर छोड़ दिया और गणपतराव भोसले के साथ अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली। परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उठाए इस कदम ने दोनों बहनों के रिश्तों में एक शुरुआती दरार डाली थी जो बरसों तक नहीं भरी। लता मंगेशकर को लगता था कि यह रिश्ता उनकी छोटी बहन के लिए ठीक नहीं है।
अपने एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने स्वीकार किया था, लता दीदी इस शादी के सख़्त ख़िलाफ़ थीं। एक दौर ऐसा भी था जब हमारे रिश्ते बहुत कड़वे हो गए थे और सालों तक हमारे बीच बातचीत तक बंद रही।
गणपतराव भोसले के साथ शादी उनकी निजी और पेशेवर ज़िंदगी के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी। आशा भोसले ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा, वह एक रूढ़िवादी परिवार था जिसे एक ‘सिंगिंग स्टार’ बहू मंज़ूर नहीं थी। मेरे पति बेहद बदमिज़ाज थे, शायद उन्हें दूसरों को दर्द देने में मज़ा आता था। पर बाहर किसी को इसकी कानों-कान ख़बर नहीं होती थी। तनाव और उथल-पुथल भरे इन सालों में आशा का करियर भी कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ रहा था। जबकि लता इन सालों में क़ामयाबी के उस शिखर पर पहुंच चुकी थीं।
आशा के करियर को शुरुआती मज़बूती बिमल रॉय की ‘परिणीता’ (1953) और राज कपूर की ‘बूट पॉलिश’ (1954) के गीतों से मिली। लेकिन उनकी ज़िंदगी का बड़ा मोड़ आया जब उनकी मुलाकात हुई संगीतकार ओपी नैयर के साथ। नैयर का मानना था कि वे लता के बिना भी सुपरहिट संगीत दे सकते हैं।
लता भी उनके साथ काम नहीं करती थीं। नैयर की शुरुआती पसंद गीता दत्त थीं, लेकिन फ़िल्म ‘सी.आई.डी.’ के बाद उनके संगीत में आशा भोसले ने जगह बना ली। उन्होंने आशा की आवाज़ के निचले सुरों की गहराई को पहचाना और ‘नया दौर’ (1957) के ज़रिए एक इतिहास रच दिया। ‘उड़े जब-जब जुल्फें तेरी’ और ‘मांग के साथ तुम्हारा’ जैसे गीतों ने आशा को पहली बार फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री की आवाज़ बनाया और उन्हें बीआर चोपड़ा जैसे बड़े कैंप का हिस्सा बना दिया। उसी साल (1957), संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच हुए मनमुटाव ने आशा के लिए सफलता के नए दरवाज़े खोल दिए।
अगले पांच सालों तक जब एसडी बर्मन ने लता के साथ काम नहीं किया, तब आशा उनके कैंप की मुख्य गायिका बनकर उभरीं।
फ़िल्मी गलियारों और पत्रिकाओं में उन दिनों यह चर्चा गर्म थी कि इस बात को लेकर भी लता अपनी बहन काफी नाराज़ थीं। लेकिन इन पांच सालों में आशा ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया। एसडी बर्मन, किशोर कुमार, आशा भोसले और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने रूमानी और चुलबुले गीतों का एक नया दौर शुरू किया।
‘हाल कैसा है जनाब का’ (चलती का नाम गाड़ी), ‘आंखों में क्या जी’, ‘छोड़ दो आंचल’ (पेइंग गेस्ट) और ‘दीवाना मस्ताना हुआ दिल’ (बंबई का बाबू) जैसे यादगार नगमे आज तक लोग याद करते हैं। एसडी बर्मन ने आशा को केवल शोख़ी और चुलबुलेपन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनकी आवाज़ की गहराई को तराशा। फ़िल्म काला पानी में आशा का ‘अच्छा जी मैं हारी’ जैसा शोख़ी वाला रोमांटिक गीत भी था और ‘नज़र लगी राजा तोरे बंगले पर’ (काला पानी) जैसा ठुमरी अंदाज़ वाला गीत भी। वहीं ‘सुजाता’ और ‘लाजवंती’ जैसी फ़िल्मों में उनसे बेहद गंभीर और संजीदा गीत गवाकर यह साबित कर दिया कि आशा हर रंग में माहिर हैं।
