राजेश जायसवाल/मुंबई
पत्रकार समाज का आईना होता है। इसलिए पत्रकारों को किसी भी खबर को सत्यता के बाद ही प्रकाशित करना चाहिए। वर्तमान में पत्रकारिता ‘संक्रमण’ की अवस्था से गुजर रहा है लेकिन आने वाले दिनों में पत्रकारिता अपने सामाजिक दायित्व मूल्यों के साथ जनता के बीच फिर स्थान बनाएगी..उक्त बातें महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कही।
‘मुंबई हिंदी पत्रकार संघ’ द्वारा सोमवार, (1 जून) को रविंद्र नाट्य मंदिर के खचाखच भरे नवीन सभागृह (करिश्मा हाल) में हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि मुझे बहुत खुशी है कि हिंदी पत्रकारिता को 200 साल पूरे होने के उपलक्ष में हमारे मुंबई में ‘हिंदी पत्रकार संघ’ ने बहुत ही भव्य कार्यक्रम यहां पर आयोजित किया और इस कार्यक्रम के लिए विशेष रूप से हमारे उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जी यहां पधारे, मैं उनका बहुत-बहुत स्वागत एवं अभिनंदन करता हूं।

CM फडणवीस ने कहा कि हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में विशेष रूप से जब से पत्रकारिता शुरू हुई और जिसका बार-बार यहां पर उल्लेख हुआ कि जो पहला हिंदी अखबार बंगाल में निकला और जिस समय बंगाल में अंग्रेजों के शासन में अंग्रेजी अखबार, फारसी और बंगाली इनके लिए सरकार मदद करती थी। ऐसे समय जब ‘उदन्त मार्तण्ड’ की शुरुआत हुई तो वहां एक हिंदी अखबार निकालना यह अपने आप में एक बहुत ही बड़ा काम था। लेकिन वहां से जो शुरुआत हुई, उसके बाद देश को लगातार दिशा देने का काम हमारी हिंदी पत्रकारिता ने किया है। हिंदी भाषा देश को जोड़ती है। लेकिन हमें दूसरी भाषाओं का भी सम्मान करना चाहिए। आज के दौर में बहुभाषी होना बहुत महत्वपूर्ण है।
हम लोगों ने देखा कि भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में जो हमारे नायक रहे, जो हमारे स्वतंत्रता के आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करने वाले हमारे सेनानी रहे, आजादी के समय इनमें से कई लोग हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से स्वतंत्रता की अग्नि को प्रज्वलित करने का काम करते थे। इसलिए निश्चित रूप से मैं ऐसा मानता हूं कि जब हिंदी पत्रकारिता को 200 साल पूरे हो रहे हैं, ऐसे समय कुछ लोगों का सम्मान होना यह भी अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। आज जिनका हमने सम्मान किया, गंगाधर ढोबले जी उन्होंने मुझे बताया कि मेरे जो पिताजी थे, उनके साथ उनकी दोस्ती थी क्योंकि वह तो मूलतः केळवद के हैं, तो नागपुर के हैं और उन्होंने कहा कि मेरे मित्र के बेटे के हाथों से मेरा सम्मान हो रहा है, यह मेरे लिए बहुत गर्व की बात है। मैं तो ऐसा मानता हूं कि उनका आशीर्वाद यह पिता का आशीर्वाद मुझे आज प्राप्त हुआ है।
दूसरे, उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति लखनऊ के हेमंत तिवारी जी हैं, और कुमुद जी को तो हम बहुत सालों से मंत्रालय में, विधानभवन में और महाराष्ट्र में पत्रकारिता करते हुए हमने उनको देखा है। महाराष्ट्र की राजनीति की नब्ज जिनको मालूम है, ऐसी कुमुद चावरे जी हो या फिर अवधेश व्यास जी, जो नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक रहे हैं, उनका भी आज हमने सम्मान किया है। और विशेष रूप से हम लोगों ने विनीत कुमार सिंह जी का सम्मान किया है, जिन्होंने हम सबका एक प्रकार से केवल मनोरंजन नहीं, उन्होंने कवि कलश की भूमिका को निभाया। जो कि मराठा साम्राज्य के छत्रपति संभाजी महाराज के परम मित्र, मुख्य सलाहकार और युद्ध रणनीतिकार थे। अभी जब यहां पर वो कविता कह रहे थे तो इस सभागार में ऐसा कोई नहीं था जिसके रोंगटे खड़े नहीं हुए। मुझे ऐसा लगता है कि वो जो अनुभव है, जो अनुभूति है और जो एक छत्रपति संभाजी महाराज की ऊर्जा है, उस ऊर्जा को फिर एक बार प्रवाहित करने का काम विनीत जी ने किया है।

सीएम फडणवीस ने आगे कहा कि हिंदी पत्रकार संघ के जो सभी पदाधिकारी हैं, उनको मैं ये कहना चाहूंगा कि आपने इस 200वें वर्षगांठ पर जिन लोगों को सम्मान के लिए चुना है, वो बहुत अच्छे नाम हैं और इन लोगों ने बहुत सेवा की है। मैं सभी को बधाई देता हूं और निश्चित रूप से उनकी सेवा इसी प्रकार से अविरत चलती रहे, ऐसा ईश्वर के चरणों में प्रार्थना भी करता हूं। हम सभी लोग जानते हैं कि जिनको हिंदी पत्रकारिता का भीष्माचार्य कहा जाता है, ऐसे मराठी भाषी बाबूराव पराड़कर जी, वे मूलतः कोंकण के थे और बाद में उत्तर प्रदेश में जाकर जिस प्रकार से हिंदी पत्रकारिता की सेवा की और हिंदी पत्रकारिता के विकास में उनका जो योगदान रहा है, वो बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।
महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश का और विशेष रूप से ‘हिंदी’ और ‘मराठी’ का जो रिश्ता है, वैसे ही जैसे छत्रपति संभाजी महाराज के साथ कवि कलश थे, वैसे ही जब छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक करना था तो बात आई कि जो देश के जाने-माने विद्वान हैं, उनमें से कोई आकर उनका सम्मान करें, तो उस समय काशी से गागाभट्ट जी को बुलाया गया, जिन्होंने आकर छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया। लेकिन यह भी मैं कहना चाहता हूं कि रिश्ता तब शुरू नहीं हुआ, यह रिश्ता ऐसा है कि गागाभट्ट जी का परिवार भी महाराष्ट्र से ही जाकर ‘काशी’ में बसा हुआ था। इसलिए मैं ऐसा मानता हूं कि ये ज्ञान की धारा महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की बहुत सदियों से बहती हुई आई है।
जैसा ब्रजेश पाठक जी ने बताया कि हमारी जो भाषा है, हिंदी हो, मराठी हो, ये भाषाएं भी जो संस्कृत को अपनी मां मानती हैं, जो देवनागरी लिपि में जिन भाषाओं ने एक प्रकार से अपनी लिपि को तैयार किया है। और मैं तो हमेशा कहता हूं कि आपको अगर मराठी और हिंदी ये कैसे लिखना है, इसमें आप ज्यादा पढ़े नहीं होंगे, तो बहुत सिंपल है। जहां हिंदी में ई की मात्रा बड़ी है, वहां मराठी में छोटी कर दीजिए। जहां उ की मात्रा छोटी है, वहां बड़ी कर दीजिए। इतना ही फर्क है, उससे ज्यादा फर्क नहीं है। इसलिए ये दोनों भाषाएं भी एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। और एक बहुत अच्छी बात ब्रजेश जी ने कही, ये हमारी जो भारतीय भाषा है या जो हमारी मातृभाषाएं हैं, ये इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि देखिए, दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति के रूप में हमारी भारतीय संस्कृति को देखा जाता है। और दुनिया ये मानती है कि कंटीन्यूअस सिविलाइजेशन, एक सभ्यता जो कभी खंडित नहीं हुई, अखंडित सभ्यता के रूप में भारत से पुरानी सभ्यता कोई नहीं है। और इस अखंडित सभ्यता को अगर समझना है, आप भारतीय भाषा में ही उसको समझ सकते हैं, आप किसी दूसरी भाषा में नहीं समझ सकते। क्योंकि जिस समय दूसरी भाषाओं का जन्म भी नहीं हुआ था, उस समय भी इस भारत में भाषाएं थीं, वो भाषाएं अपना इतिहास लिखती थीं, वो भाषाएं अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम करती थीं। और ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अगर दुनिया का इतिहास देखें, तो दुनिया में दो प्रकार की अर्थव्यवस्थाएं दिखती हैं- एक विकसित अर्थव्यवस्था और दूसरी विकासशील अर्थव्यवस्था। और एक बात देख लीजिए, जितने विकसित राष्ट्र हैं, उनमें उनके पढ़ाई का माध्यम उनकी मातृभाषा है और जितने विकासशील राष्ट्र हैं, इनमें उनके ऊपर जिन्होंने राज किया, उनकी भाषा में लोग पढ़ रहे हैं। वो मातृभाषा में नहीं पढ़ते हैं। इसलिए मातृभाषा में जो पढ़ रहे हैं, वो आगे निकल गए और जो थोपी हुई भाषा में पढ़ रहे हैं, वो कहीं ना कहीं अभी भी लड़ रहे हैं कि हम विकसित होना चाहते हैं।
आप जर्मन में जाइए तो जर्मनी भाषा में ही पढ़ना पड़ता है। जापान में जाइए, तो जापानी भाषा में पढ़ना पड़ता है। चीन ने भी ये ध्यान में लिया और चीनी भाषा में वो लोग वहां पढ़ते हैं। फ्रांस में जाइए, तो फ्रेंच भाषा में पढ़ना पड़ता है। अब अमेरिका और इंग्लैंड की भाषा ही अंग्रेजी है, तो वहां अंग्रेजी में पढ़ना पड़ता है। तो दुनिया के विकसित राष्ट्रों ने, कोरिया में कोरियन भाषा में पढ़ना पड़ता है। हम ही लोग हैं कि जिन लोगों ने धीरे-धीरे अपनी भाषाओं को पीछे रखकर, हमको ये लगा कि अंग्रेजी में पढ़कर ही हम ‘साहब’ बनेंगे और ‘साला मैं तो साहब बन गया’ गाना हमने बोल दिया, लेकिन ‘साहब’ बने ही नहीं। तो इसलिए मुझे लगता है कि आज जो प्रधानमंत्री जी ने हमारी मातृभाषा को एक प्रकार से सम्मान देने की बात की और मातृभाषा में पहली बार हमारे देश के अंदर हम लोग पढ़ रहे हैं, तो इसका निश्चित रूप से मैं ऐसा मानता हूं कि हमारे विकास में एक बहुत बड़ा फायदा होगा। एक चीज़ और मैं कहना चाहता हूं कि जो अमित साटम जी ने यहां पर कहा, भाषा ये तो संपर्क का ही माध्यम है, ये विवाद का माध्यम कभी हो ही नहीं सकता। और मैं तो ये मानता हूं कि बहुभाषी होना, ये भी अपने आप में आज बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी मातृभाषा को तो हमें सीखना ही चाहिए, क्योंकि मातृभाषा नहीं आएगी तो हम एक बहुत ही नैसर्गिक इस प्रकार की ज्ञान प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। इसलिए मातृभाषा तो आनी ही चाहिए, लेकिन मातृभाषा के साथ कोई और हमारे देश की भाषा अगर हम लोग सीखेंगे, तो मुझे ऐसा लगता है कि देश का ये जो ज्ञान है, उस ज्ञान को हम निश्चित रूप से बटोर पाएंगे।
आज देखिए, इस देश में इतनी विविधता है और हर भाषा ने हमको इतना साहित्य दिया है, इतना विचार दिया है, इतने प्रकार के, चाहे वो संगीत हो, चाहे नाटक हो, हर क्षेत्र में और साहित्य का क्षेत्र। तो मैं ऐसा मानता हूं कि समृद्ध सारी भाषाओं ने किया है और विशेष रूप से ‘हिंदी’ तो ऐसी भाषा है, हमारे देश में हमने राष्ट्रभाषा का दर्जा देश की सारी भाषाओं को दिया है। मराठी भी राष्ट्रभाषा है, तमिल भी राष्ट्रभाषा है, तेलुगू भी राष्ट्रभाषा है, लेकिन ‘राजभाषा’ का दर्जा ये हमने देश में हिंदी को दिया है और एक प्रकार से संपर्क का सूत्र बनाने का कार्य इस देश में हिंदी करता है। आज देखिए जो हमारी तमिल भाषा है, इस तमिल भाषा में जो साहित्य तैयार हुआ है, तमिल भाषा में जो ज्ञान है, आज तमिल ये दुनिया की, क्योंकि संस्कृत तो बहुत पुरानी भाषा है, लेकिन संस्कृत तो रोज की बोलचाल की भाषा नहीं है, बोलचाल की भाषाओं में दुनिया में सबसे पुरानी भाषा अगर कोई होगी तो तमिल भाषा है और उसमें इतना ज्ञान है। लेकिन अगर हम लोग भाषाओं का विरोध करेंगे, भाषाएं नहीं पढ़ेंगे, भाषाओं पर विवाद करेंगे तो इससे शायद किसी को वोट मिल जाएगा, किसी को कुर्सी मिल जाएगी, लेकिन देश का ज्ञान समाप्त हो जाएगा। देश के ज्ञान की ये जो परंपरा है, उस परंपरा को हम लोग अपने आने वाली पीढ़ियों तक नहीं पहुंचा पाएंगे। इसलिए सभी भाषाओं का सम्मान हो और विशेष रूप से हिंदी जैसी भाषा, जिस भाषा ने हमारे स्वतंत्रता की लड़ाई में भी एक बहुत बड़ा योगदान दिया है, हमारे देश के विमर्श को लोगों तक पहुंचाने में एक बहुत बड़ा योगदान दिया है, मैं ऐसा मानता हूं वो बहुत महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से जैसे मैंने, मेरा छह-सात-आठ साल पुराना भी एक वीडियो हमने यहां पर देखा, तो मैं ये मानता हूं कि आज पत्रकारिता के सामने बहुत चुनौतियां हैं क्योंकि माध्यम इतने बदले हैं। पहले हम लोग जानते थे कि प्रिंट मीडिया था, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया, अब डिजिटल मीडिया और फिर उसके बाद सोशल मीडिया। अब ये सारे लोग, मतलब पहले तो आप सब जो यहां बैठे हुए पत्रकार हैं, आप ही पत्रकार थे, अब हम भी पत्रकार बन गए। हम भी रोज खबर फैलाते हैं, हम भी रोज खबर ट्वीट करते हैं, हम भी रोज खबर फेसबुक पर डालते हैं, हम ही अपना फोटो खिंचवा-खिंचवाकर उसके नीचे हम ही खबर बनाते हैं और उसको लोगों तक पहुंचाते हैं। तो इतने चैलेंजेस आज पत्रकारिता के सामने खड़े हुए हैं। सवाल ये नहीं है कि कोई खबर कितनी वायरल होती है, सवाल ये है कि उस खबर में ऑथेंटिसिटी कितनी है। किसी भी खबर का मूल्य जो है, वो उसके वायरल होने पर नहीं है, वो खबर कितनी सच्ची है, वो खबर कितनी यथार्थ के साथ तैयार हुई है, ये बहुत महत्वपूर्ण है। और आज तो हम लोग देखते हैं, विशेष रूप से मेरी शिकायत तो डिजिटल मीडिया के साथ है, मैं तो हमेशा मजाक में बोलता हूं कि अगर पांच-छह पत्रकारों को लेकर बैठ जाऊं, और ऐसे ही मजाक में मैं बोल दूं कि अमेरिका का राष्ट्रपति बनने का न्योता मुझे भी आया था, एक तो ऐसा निकलेगा जो प्रश्नचिन्ह डालकर लिख देगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति का न्योता देवेंद्र फडणवीस को आया था?
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में पत्रकारिता ‘संक्रमण’ की अवस्था से गुजर रहा है लेकिन आने वाले दिनों में पत्रकारिता अपने सामाजिक दायित्व मूल्यों के साथ जनता के बीच फिर स्थान बनाएगी। क्यूंकि पत्रकारिता को हमने चौथे स्तम्भ का दर्जा इसलिए दिया कि लोकतंत्र के तीन स्तम्भ कभी भी पथभ्रष्ट होंगे तो उनको मूल्य सीखाने का काम ये चौथा स्तम्भ करेगा।

‘हिंदी’ हृदय से निकलती है: ब्रजेश पाठक
कार्यक्रम में विशेष अतिथि के तौर पर यूपी से पधारे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा इस कार्यक्रम की गूंज केवल महाराष्ट्र-उत्तर प्रदेश नहीं पूरे देश में जाएगी। उन्होंने कहा कि कानपुर के एक युवा साथी ने आज के कोलकाता से पहला हिंदी अखबार ‘मार्तण्ड’ निकाला, अब वो मार्तण्ड धीरे-धीरे एक ‘मील का पत्थर’ साबित होकर पूरे दुनिया में हिंदी पत्रकारिता जगत का जब इतिहास लिखा जाएगा ये हम सब जानते हैं। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में पत्रकारिता कठिन दौर से गुजर रहा है। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद हिंदी पत्रकारिता ने अपने अस्तित्व को बरकरार रखा है। पाठक ने ये भी कहा, ‘हिंदी’ हृदय से निकलती है लेकिन हमें क्षेत्रीय भाषाओं के साथ चलना होगा।
‘हिंदी’ भाषा ही नहीं बल्कि एकता का प्रतीक है: अमित साटम
वहीं, भाजपा मुंबई के अध्यक्ष एवं विधायक अमित साटम ने कहा कि 1826 में हिंदी का पहला अखबार ”उदन्त मार्तण्ड” निकाला गया। पूरी दुनिया में तीसरी भाषा हिंदी बोली जाती है। हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि एकता का प्रतीक है जो देश को एक सूत्र में बांधती है।
इन लोगों को किया गया सम्मानित!
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हिंदी पत्रकारिता में योगदान देने वाले वरिष्ठ पत्रकार गंगाधर ढोबले, हेमंत तिवारी, कुमुद संघवी चावरे, विनीत कुमार सिंह, अवधेश व्यास को सम्मानित किया। इसी प्रकार प्रो. राम मोहन पाठक एवं गायक सुरेश शुक्ला को भी सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, महाराष्ट्र के कौशल विकास मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा, विधायक अमित साटम, विधायक राजहंस सिंह, विधायक मुरजी पटेल, विधायक संजय उपाध्याय, भाजपा महाराष्ट्र प्रदेश उत्तर भारतीय मोर्चा के अध्यक्ष संजय पांडेय, संतोष आरएन सिंह, योगायतन ग्रुप ऑफ कंपनी के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रताप सिंह, उद्योगपति ज्ञान प्रकाश सिंह व मुंबई के प्रतिष्ठित श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर के कोषाध्यक्ष आचार्य पवन त्रिपाठी सहित विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। मुंबई हिंदी पत्रकार संघ के महासचिव विजय सिंह कौशिक ने प्रस्तावना में संघ के कार्यों की जानकारी दी। अध्यक्ष आदित्य दुबे के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम को सफल बनाने में राजकुमार सिंह, सुरेंद्र मिश्र, हरिगोविंद विश्वकर्मा, सैयद सलमान, अखिलेश तिवारी, अखिलेश मिश्रा, शैलेश तिवारी व अशोक शुक्ला ने सराहनीय योगदान दिया।
