जिस ‘वन्दे मातरम्’ की हुंकार ने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत को स्वतंत्रता के लिए उठ खड़ा किया, उसी राष्ट्रगीत को आज दो पदों में बांधने की जिद आखिर क्यों? आज़ादी के 80 वर्ष बाद भी कांग्रेस 1937 के अपने निर्णय से बाहर निकलने को तैयार क्यों नहीं है! आज तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है।
राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में पूरा छह-पद वाला ‘वन्दे मातरम्’ गूंजता है। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी 150 वर्ष की गौरवगाथा को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कांग्रेस के दो पदों वाले निर्णय को देशविरोधी और तुष्टीकरण की राजनीति बताते हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा इसे कर्तव्य और राष्ट्रसेवा का आह्वान कहते हैं और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी कांग्रेस की इस नीति पर खुलकर प्रश्न उठाते हैं। तब सवाल कांग्रेस से सीधा है राजनीतिक मतभेद रखिए, सरकार का विरोध कीजिए, लेकिन ‘भारत माता’ की वंदना को दो हिस्सों में क्यों बाँटिए?
‘वन्दे मातरम्’ किसी एक दल का नारा नहीं है बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता-संघर्ष और मातृभूमि के सम्मान का स्वर है। राजनीति अलग हो सकती है, पर राष्ट्र के मान-सम्मान और स्वाभिमान पर देश के सभी नागरिकों का स्वर एक होना चाहिए। जब देश की एकता, सुरक्षा और गौरव की बात आती है, तब आपसी मतभेद भुलाकर हर भारतीय को एक साथ खड़े होना चाहिए, क्योंकि ‘राष्ट्र’ सर्वोपरि है।
‘वन्दे मातरम्’
प्रोफेसर डॉ दयानंद तिवारी
(प्रवक्ता – भाजपा मुंबई)
