नेटवर्क महानगर/नवी मुंबई
नवी मुंबई के वाशी में साइबर ठगी का एक संगीन मामला सामने आया है। यहां रहने वाले 68 वर्षीय मजदूर नेता को साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर फर्जी डिजिटल अरेस्ट का शिकार बनाकर 20 लाख 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी की। आरोपियों ने खुद को सरकारी अधिकारी बताकर बुजुर्ग को मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग जैसे गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी दी। ठगों ने सुप्रीम कोर्ट के नाम पर जाली दस्तावेज दिखाकर पीड़ित को विश्वास दिलाया कि वह किसी बड़ी जांच के दायरे में है। डर और दबाव में आकर पीड़ित ने रकम जुटाने के लिए वाशी में ‘मुथूट फाइनेंस’ में अपने परिवार के गहने गिरवी रख दिए और धोखेबाजों के बताए अकाउंट में RTGS के जरिए 20.50 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।
शिकायत के अनुसार, पीड़ित को सितंबर में एक आदमी का कॉल आया जिसने खुद को डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया का ऑफिसर मनोज पटेल बताया। उसने दावा किया कि पीड़ित के नाम पर केनरा बैंक में एक अकाउंट खोला गया है और उसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग केस में किया गया है। कॉल करने वाले ने उनसे विवादित रकम को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में जमा करने को कहा। धोखेबाजों ने WhatsApp के जरिए सुप्रीम कोर्ट का एक नकली लेटर भेजा, जिस पर भारत सरकार के सेक्रेटरी वरुण मित्रा के कथित साइन थे। एक और कॉलर ने खुद को को-ऑर्डिनेटर संजय मल्होत्रा बताकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने को कहा। जब पीड़ित ने कहा कि वह पैसे का इंतजाम नहीं कर सकता, तो खुद को सीनियर अधिकारी प्रदीप जायसवाल बताने वाले एक आदमी ने गिरफ्तारी और उम्रकैद की धमकी दी। वीडियो कॉल के दौरान प्रदीप जायसवाल पुलिस की वर्दी में दिखाई दिया। पैसे मिलने के बाद उन्होंने जवाब देना बंद कर दिया। पीड़ित को डिजिटल अरेस्ट स्कैम के बारे में अखबार में रिपोर्ट पढ़ने के बाद एहसास हुआ कि उसके साथ धोधोखाधड़ी हुआ है। तब उसने साइबर हेल्पलाइन 1930 पर और वाशी पुलिस से संपर्क किया। शिकायत के आधार पर वाशी पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और आरोपी का पता लगा रही है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, साइबर ठगों ने वाशी निवासी मजदूर नेता और सामाजिक कार्यकर्ता को पहले खुद को सरकारी अधिकारी के रूप में प्रस्तुत किया और इसके बाद पीड़ित को गंभीर आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी देना शुरू कर दिया। उन्होंने दावा किया कि पीड़ित का नाम मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण से जुड़े मामलों की जांच में सामने आया है। इन आरोपों के माध्यम से बुजुर्ग पर मानसिक दबाव बनाया गया। ठगों ने उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि उनके खिलाफ सरकारी स्तर पर कार्रवाई चल रही है। आरोपियों ने अपने दावों को विश्वसनीय बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नाम पर तैयार किए गए कथित फर्जी दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया। इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात यह रही कि आरोपियों ने पीड़ित को कथित डिजिटल अरेस्ट में रखकर उससे इतनी बड़ी रकम वसूल ली। डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला धोखाधड़ी का तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या सरकारी अधिकारी बताकर किसी व्यक्ति को डराते हैं। इसके बाद उसे वीडियो कॉल या अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए निगरानी में होने का झूठा दावा करके पैसे देने के लिए मजबूर किया जाता है। इस मामले में भी आरोपियों ने सरकारी अधिकारियों की पहचान का सहारा लिया। उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग जैसे गंभीर आरोपों का उल्लेख करके पीड़ित को भयभीत किया। इन मामलों का नाम सुनकर बुजुर्ग को यह विश्वास हो गया कि वह किसी गंभीर कानूनी परेशानी में फंस सकते हैं। ठगों ने सुप्रीम कोर्ट के नाम पर जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। आरोप है कि इन दस्तावेजों के जरिए पीड़ित को यह भरोसा दिलाया गया कि उनके खिलाफ चल रही कथित जांच वास्तविक है। किसी संवैधानिक संस्था या न्यायिक व्यवस्था के नाम का दुरुपयोग करके लोगों को डराना साइबर धोखाधड़ी का गंभीर पहलू है। आरोपियों की ओर से लगातार बनाए गए दबाव के कारण पीड़ित को बड़ी रकम का इंतजाम करना पड़ा। ठगों की मांग पूरी करने के लिए उन्होंने अपने परिवार के गहने गिरवी रख दिए। इसके बाद आरोपियों ने उनसे कुल 20 लाख 50 हजार रुपये की कथित धोखाधड़ी की। परिवार के गहने गिरवी रखने की नौबत आना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है। साइबर अपराधियों ने केवल पीड़ित की जमा पूंजी को निशाना नहीं बनाया, बल्कि उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां रकम जुटाने के लिए पारिवारिक संपत्ति का सहारा लेना पड़ा। इस घटना से यह सामने आता है कि साइबर अपराधी किसी भी उम्र और सामाजिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को निशाना बना सकते हैं। आरोपियों ने जिस तरह सरकारी अधिकारी होने का दावा किया, उससे उनकी धोखाधड़ी की योजना का महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। किसी सरकारी पद या जांच एजेंसी के नाम का इस्तेमाल करके पीड़ित को भ्रमित करना साइबर ठगी में अपनाया जाने वाला तरीका है। इस मामले में आरोपियों ने कथित जांच को वास्तविक दिखाने के लिए जाली न्यायिक दस्तावेजों का सहारा भी लिया। घटना की शिकायत मिलने के बाद वाशी पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस अब आरोपियों की पहचान करने और ठगी की रकम का पता लगाने के लिए जांच कर रही है। जांच का प्रमुख केंद्र पैसों का लेन-देन है। पुलिस मनी ट्रेल की जांच कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पीड़ित से ली गई रकम किन खातों या माध्यमों से आगे भेजी गई। इस प्रकार की वित्तीय जांच से साइबर अपराधियों तक पहुंचने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पीड़ित ने कितनी बार में रकम भेजी और पैसे किन बैंक खातों में जमा किए गए। इसी तरह आरोपियों ने कितने दिनों तक बुजुर्ग को कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा, इसकी भी जानकारी सामने नहीं आई है। पुलिस की जांच में इन पहलुओं का महत्व हो सकता है। रकम के हस्तांतरण से जुड़े रिकॉर्ड, संबंधित बैंक खातों और डिजिटल संपर्क के माध्यमों की जांच से आरोपियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। फिलहाल, पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है और जांच जारी है। इस घटना ने एक बार फिर डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर धोखाधड़ी के खतरे को उजागर किया है। ठग लोगों को गंभीर अपराधों में फंसाने का भय दिखाकर उनसे रकम वसूलने का प्रयास करते हैं। कई मामलों में अपराधी सरकारी संस्थाओं के नाम और कथित कानूनी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके अपनी बात को विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं। यह समझना जरूरी है कि भारतीय कानून में किसी व्यक्ति को केवल फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से इस प्रकार डिजिटल अरेस्ट में रखने की कोई वैध व्यवस्था नहीं है। किसी अनजान व्यक्ति द्वारा खुद को सरकारी अधिकारी बताकर पैसे मांगना या गिरफ्तारी का डर दिखाना साइबर धोखाधड़ी का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में किसी भी व्यक्ति को डरकर रकम भेजने के बजाय संबंधित सरकारी संस्था से स्वतंत्र रूप से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। संदिग्ध कॉल या ऑनलाइन संपर्क के दौरान व्यक्तिगत और बैंकिंग जानकारी साझा करने से भी बचना चाहिए। वाशी के मामले में पुलिस अब वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़कर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। पीड़ित से ठगी गई रकम की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी के संबंध में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल, वाशी पुलिस ने अज्ञात साइबर ठगों के खिलाफ आईटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस मनी ट्रेल के जरिए आरोपियों की पहचान करने में जुटी है। इस घटना ने साइबर अपराधियों द्वारा सरकारी अधिकारियों और न्यायिक संस्थाओं के नाम का दुरुपयोग करके लोगों को ठगने के बढ़ते खतरे की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
महत्वपूर्ण चेतावनी
ध्यान रखें कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां (जैसे पुलिस, CBI, या ED) कभी भी व्हाट्सएप या वीडियो कॉल पर किसी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती हैं और न ही वेरिफिकेशन के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने की मांग करती हैं। यदि आपके साथ ऐसा कोई संदिग्ध कॉल आता है, तो तुरंत फोन काट दें और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल या हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।
